madhubala ki kalam se मधुबाला की कलम से

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माँ शारदे की कृपा से मेरा दूसरा काव्य संग्रह 'मधुबाला की कलम से' पूरा हो पाया है। ये काव्य संग्रह भारतीय सेना के जवानों और देश के किसानों को समर्पित है। सरहद पर जवान अपने प्राणों की आहुति देकर हम लोगों को चैन की साँस लेने देते हैं मेरा रोम रोम उनके अहसानों को मानता है और महसूस भी करता है। देश का किसान यानि अन्नदाता जो अन्न उगाता है खुद भूखा रहकर हमें कमी नहीं आने देता। उनके बलिदानों को नमन है। लेखन वही जो समाज का आईना हो । शुरुवाती दौर में अधिकतर कवि और लेखक अपनी रचनाओं में अपने से संबंधित और अन्य संवेदनाओं को प्रकट करते हैं तो कविताओं का दायरा अपने तक ही सीमित रहता है परंतु दूसरे चरण में कवि या लेखक सामाजिक कुरूतियों या आस पास घटती घटनाओं के विषय और चिंतन पर लिखता है उसकी सोच का दायरा बृहत होता जाता है। इस किताब में ज्वलंत विषयों, सामाजिक कुरूतियों, कुछ व्यक्ति विशेष को समर्पित रचनाएँ एवम कुछ प्रेम गीत, गज़लें हैं। कुछ छंदोबद्ध तो कुछ अतुकांत कवितायें हैं। सवैया छंद में प्रथम प्रार्थना के पश्चात परमवीर चक्र प्राप्त अब्दुल हामिद की आल्हा वीर छंद में शौर्य गाथा है (अविजित पैटन टैंको की, वैसे तो थी अद्भुत बात पर हिंदी सेना के आगे उनकी आखिर क्या औकात) महिलाओं से जुड़ी सामाजिक कुरीतियाँ और उन पर होते अत्याचार कवि  मन को उद्वेलित कर जाते है। देशव्यापी नारे का समर्थन करती मेरी रचना (बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ) एक ओजपूर्ण शैली में लिखी कविता है। इसी क्रम में (पापा हँसकर बस चुप हो जाते) ये कविता एक नन्हीं बच्ची की पुरुष वर्ग जैसे पापा, भाइयों से गुहार है कि वो सामने आये और इंसानी रूप में वहशी दरिंदों से उसकी रक्षा करें। केवल दर्शक बनें चुप न रहें। कविता (ये अंधियारा छट जाएगा) कानून के लचर स्वभाव पर है जो इक्कीसवीं सदी में भी महिला सुरक्षित नहीं। कविता (वक्रता ही कला है), (चक्रवाती जीवन), (ममता में वारी जाती हूँ), गीत - (जो न समझा दिवाना है), (रफ्तार) एवम् (समय का पहिया) अध्यात्म एवम् कुछ अलग सोच की रचनायें हैं जिन्हें आपका स्नेह अवश्य मिलेगा। श्रृंगार रस रसों का प्रधान रस है उसी रस में एक अति प्रिय रचना (नादां दिल उसको दे बैठी), (गीत-सूना है मधुमास), (गीत तेरे साथ जी रहे है) एवम चंद खूबसूरत ग़ज़लें, नज़में और रुबाइयाँ हैं। हास्य और व्यंग्य जीवन का अभिन्न अंग हैं हास्य गीत (इंटरनेट बाबा) एवम (ऐसों से बचा भगवान) एवम हास्य ग़ज़ल (सनम मेरा) आपको अवश्य गुदगुदाएगा। सामाजिक मुद्दों पर कविता आरक्षण किसी समूह विशेष पर कटाक्ष नही वरन पीड़ित जनता की पुकार है। एक रचना (माँ केवल शब्द नहीं ) अपनी माँ को समर्पित है, (आँगन की कली ) रचना अपनी पोती को समर्पित है। एक रचना अपने दोते आरनव के लिये (माँ कहकर मुझे पुकारा है) । आशा करती हूँ आप सब मेरी रचनाओं को पसंद करेंगे और अपना स्नेह देकर कृतार्थ करेंगे ।

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माँ शारदे की कृपा से मेरा दूसरा काव्य संग्रह ‘मधुबाला की कलम से’ पूरा हो पाया है। ये काव्य संग्रह भारतीय सेना के जवानों और देश के किसानों को समर्पित है। सरहद पर जवान अपने प्राणों की आहुति देकर हम लोगों को चैन की साँस लेने देते हैं मेरा रोम रोम उनके अहसानों को मानता है और महसूस भी करता है। देश का किसान यानि अन्नदाता जो अन्न उगाता है खुद भूखा रहकर हमें कमी नहीं आने देता। उनके बलिदानों को नमन है। लेखन वही जो समाज का आईना हो । शुरुवाती दौर में अधिकतर कवि और लेखक अपनी रचनाओं में अपने से संबंधित और अन्य संवेदनाओं को प्रकट करते हैं तो कविताओं का दायरा अपने तक ही सीमित रहता है परंतु दूसरे चरण में कवि या लेखक सामाजिक कुरूतियों या आस पास घटती घटनाओं के विषय और चिंतन पर लिखता है उसकी सोच का दायरा बृहत होता जाता है। इस किताब में ज्वलंत विषयों, सामाजिक कुरूतियों, कुछ व्यक्ति विशेष को समर्पित रचनाएँ एवम कुछ प्रेम गीत, गज़लें हैं। कुछ छंदोबद्ध तो कुछ अतुकांत कवितायें हैं। सवैया छंद में प्रथम प्रार्थना के पश्चात परमवीर चक्र प्राप्त अब्दुल हामिद की आल्हा वीर छंद में शौर्य गाथा है (अविजित पैटन टैंको की, वैसे तो थी अद्भुत बात पर हिंदी सेना के आगे उनकी आखिर क्या औकात) महिलाओं से जुड़ी सामाजिक कुरीतियाँ और उन पर होते अत्याचार कवि  मन को उद्वेलित कर जाते है। देशव्यापी नारे का समर्थन करती मेरी रचना (बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ) एक ओजपूर्ण शैली में लिखी कविता है। इसी क्रम में (पापा हँसकर बस चुप हो जाते) ये कविता एक नन्हीं बच्ची की पुरुष वर्ग जैसे पापा, भाइयों से गुहार है कि वो सामने आये और इंसानी रूप में वहशी दरिंदों से उसकी रक्षा करें। केवल दर्शक बनें चुप न रहें। कविता (ये अंधियारा छट जाएगा) कानून के लचर स्वभाव पर है जो इक्कीसवीं सदी में भी महिला सुरक्षित नहीं। कविता (वक्रता ही कला है), (चक्रवाती जीवन), (ममता में वारी जाती हूँ), गीत – (जो न समझा दिवाना है), (रफ्तार) एवम् (समय का पहिया) अध्यात्म एवम् कुछ अलग सोच की रचनायें हैं जिन्हें आपका स्नेह अवश्य मिलेगा। श्रृंगार रस रसों का प्रधान रस है उसी रस में एक अति प्रिय रचना (नादां दिल उसको दे बैठी), (गीत-सूना है मधुमास), (गीत तेरे साथ जी रहे है) एवम चंद खूबसूरत ग़ज़लें, नज़में और रुबाइयाँ हैं। हास्य और व्यंग्य जीवन का अभिन्न अंग हैं हास्य गीत (इंटरनेट बाबा) एवम (ऐसों से बचा भगवान) एवम हास्य ग़ज़ल (सनम मेरा) आपको अवश्य गुदगुदाएगा। सामाजिक मुद्दों पर कविता आरक्षण किसी समूह विशेष पर कटाक्ष नही वरन पीड़ित जनता की पुकार है। एक रचना (माँ केवल शब्द नहीं ) अपनी माँ को समर्पित है, (आँगन की कली ) रचना अपनी पोती को समर्पित है। एक रचना अपने दोते आरनव के लिये (माँ कहकर मुझे पुकारा है) । आशा करती हूँ आप सब मेरी रचनाओं को पसंद करेंगे और अपना स्नेह देकर कृतार्थ करेंगे ।

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