KABHI TO AA JANA कभी तो आ जाना

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'जब जागो तभी सवेरा' वाली कहावत उस वक्त चरितार्थ हुई जब मैं अपने अरमानों की गठरी का बोझ सिर पर लिए कभी इधर तो कभी उधर भटक रहा था। हर रोज सैंकड़ों तूफान मन में उठते और शांत हो जाते, लेकिन समझ नहीं आया कि मन के उद्गारों का यह बोझ मैं सहन कर पाऊंगा या नहीं। धीरे-धीरे साहित्यिक तूफान एक ज्वालामुखी बनकर फटने को तैयार हो रहे थे। हरियाणा प्रदेश के एक सामान्य परिवार गाँव धरौदी, तहसील नरवाना, जिला जीन्द में जन्म लिया और बचपन से ही गायन व लेखन का जुनून लिए मैं साहित्य की डगर पर चल पड़ा, अनजान मुसाफिर और कठिन डगर, मैं अपने अरमानों की गठरी लिए भटकता रहा और मंजिल को प्राप्त करने की उम्मीद मन में लिए मैं संघर्षमय उस साहित्य के पथ पर चलता रहा, जहां फूल नहीं सिर्फ कांटे थे परंतु मंजिल को प्राप्त करने का यह जज्बा यह जुनून मेरी गति को बढ़ाता रहा और साहित्य जगत् के समुद्र के किनारे बैठकर कुछ लिखने का प्रयास करने लगा। सच कहा कि गुरु बिना ज्ञान नहीं। लक्ष्य का मेरा अंधापन आज मुझे साहित्य रूपी समुद्र के किनारे पर खड़ा कर गया जहां साहित्य की रचना करने वाले लाखों मुसाफिर आते रहे और ज्ञान रूपी सागर में गोता लगाकर इतिहास के पन्नों पर अपना नाम लिख कर चले गये । शायद मेरा यह स्वप्न पूरा नहीं हो पाता यदि साहित्य के किनारे पर मुझे डॉ. जगबीर राठी, डॉ. सुषमा आर्य जी, श्री अनूप लाठर जी, श्री महावीर गुड्डू, प्रोफेसर रोशनलाल श्योरण, भाल सिंह बल्हार जी यदि मुझे नहीं मिलते जिन्होंने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, लिखना सिखाया जिनकी उंगलियां पकड़कर आगे बढना सीखा, और आज उनके आशीर्वाद से सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। उस जननी मां धर्म देवी व पिता श्री ज्ञानचन्द के आशीर्वाद से साहित्य जगत् की दहलीज पर अपने कदमों को रखने का प्रयास किया है और काव्य-सृजन में मेरे गुरु मेरे मार्गदर्शक डॉ. जगबीर राठी जी की प्रेरणा से एक प्रयास किया है।

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‘जब जागो तभी सवेरा’ वाली कहावत उस वक्त चरितार्थ हुई जब मैं अपने अरमानों की गठरी का बोझ सिर पर लिए कभी इधर तो कभी उधर भटक रहा था। हर रोज सैंकड़ों तूफान मन में उठते और शांत हो जाते, लेकिन समझ नहीं आया कि मन के उद्गारों का यह बोझ मैं सहन कर पाऊंगा या नहीं। धीरे-धीरे साहित्यिक तूफान एक ज्वालामुखी बनकर फटने को तैयार हो रहे थे। हरियाणा प्रदेश के एक सामान्य परिवार गाँव धरौदी, तहसील नरवाना, जिला जीन्द में जन्म लिया और बचपन से ही गायन व लेखन का जुनून लिए मैं साहित्य की डगर पर चल पड़ा, अनजान मुसाफिर और कठिन डगर, मैं अपने अरमानों की गठरी लिए भटकता रहा और मंजिल को प्राप्त करने की उम्मीद मन में लिए मैं संघर्षमय उस साहित्य के पथ पर चलता रहा, जहां फूल नहीं सिर्फ कांटे थे परंतु मंजिल को प्राप्त करने का यह जज्बा यह जुनून मेरी गति को बढ़ाता रहा और साहित्य जगत् के समुद्र के किनारे बैठकर कुछ लिखने का प्रयास करने लगा। सच कहा कि गुरु बिना ज्ञान नहीं। लक्ष्य का मेरा अंधापन आज मुझे साहित्य रूपी समुद्र के किनारे पर खड़ा कर गया जहां साहित्य की रचना करने वाले लाखों मुसाफिर आते रहे और ज्ञान रूपी सागर में गोता लगाकर इतिहास के पन्नों पर अपना नाम लिख कर चले गये । शायद मेरा यह स्वप्न पूरा नहीं हो पाता यदि साहित्य के किनारे पर मुझे डॉ. जगबीर राठी, डॉ. सुषमा आर्य जी, श्री अनूप लाठर जी, श्री महावीर गुड्डू, प्रोफेसर रोशनलाल श्योरण, भाल सिंह बल्हार जी यदि मुझे नहीं मिलते जिन्होंने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, लिखना सिखाया जिनकी उंगलियां पकड़कर आगे बढना सीखा, और आज उनके आशीर्वाद से सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। उस जननी मां धर्म देवी व पिता श्री ज्ञानचन्द के आशीर्वाद से साहित्य जगत् की दहलीज पर अपने कदमों को रखने का प्रयास किया है और काव्य-सृजन में मेरे गुरु मेरे मार्गदर्शक डॉ. जगबीर राठी जी की प्रेरणा से एक प्रयास किया है।

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