Bas ! kuano bah rahi hai (बस ! कुआनो बह रही है)

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छोटी-छोटी कविताओं का यह संग्रह 'बस ! कुआनों बह रही है' आप लोगो तक पहुंचाकर अपार आनन्द की अनुभूति कर रहा हूँ। यह मेरा प्रथम कविता-संग्रह है जिसका नामकरण बस्ती जनपद की पावन नदी कुंआनो के नाम पर किया गया है। इस नदी का अपना पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है जो जनपद वासियों के लिए आस्था का विषय है। यह नही इस जनपद की पहचान ही नही अपितु संस्कृति, संस्कार भी है। मै शहर मे जहां रहता हूँ, उसी के पास से यह नदी बहती है। इसीलिए इसे देखने का अवसर प्राप्त होता रहता है। मैं अमहट के घाट पर आकर बैठता भी हूँ। कारण इसी नदी से एक आन्तरिक प्रेरणा की अनुभूति होती है। इसकी बहती धारा मन को आनन्दित करती है लेकिन इसकी दशा देखकर वेदना भी होती है जिस कुआनों का जल पहले चाँदी जैसा चकमकता था, जो सदानीरा, प्रबल वेग से बहने वाली थी, जिसकी धाराएं कल कल की ध्वनि करती मन को आनन्दित करती थी आज इतनी कुरूप हो गयी है कि उसका संपूर्ण सौन्दर्य नष्ट सा हो गया है उसकी धाराओं मे अब वेग नही है वह कृशकाय होकर बह रही है शहर के कूड़े-कचरे, गन्दगी ने उसकी प्राकृतिक आभा को छीन लिया है और वह दिनोदिन बढ़ती गन्दगी से कराह उठी है मैंने इसी वेदना की अभिव्यक्ति संग्रह शीर्षक कविता में किया है। यद्यपि कविता छोटी है लेकिन इसका उद्देश्य सार्थक है। कुआनों जैसी न जाने कितनी नदियों का यही हाल है, लोग जागरूक हो और प्रदूषित होती जीवनदायनी नदियों को बचाने हेतु सार्थक पहल करें, जिससे इनके गौरव को अक्षय रखा जा सके। यद्यपि यह सत्य है कि बस्ती शहर के कुछ सामाजिक संगठनों ने कुंआनों नदी को स्वच्छ एवं अविरल बनाये रखने की दिशा में लोगो का ध्यान खीचा है जिसमें चित्रांश क्लब के द्वारा आयोजित 'कुंआनो आरती' का कार्यक्रम जनजागरण की दिशा में एक अच्छी पहल है। संग्रह की कविता " आज हँसी कुछ देख कुआनों" में कुआनों नही की प्रसन्नता की के माध्यम से इसी ओर इशारा किया गया है लेकिन संशय भी है जिसे इसी कविता के अन्तिम पंक्ति में व्यक्त किया गया है।

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छोटी-छोटी कविताओं का यह संग्रह ‘बस ! कुआनों बह रही है’ आप लोगो तक पहुंचाकर अपार आनन्द की अनुभूति कर रहा हूँ। यह मेरा प्रथम कविता-संग्रह है जिसका नामकरण बस्ती जनपद की पावन नदी कुंआनो के नाम पर किया गया है। इस नदी का अपना पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है जो जनपद वासियों के लिए आस्था का विषय है। यह नही इस जनपद की पहचान ही नही अपितु संस्कृति, संस्कार भी है। मै शहर मे जहां रहता हूँ, उसी के पास से यह नदी बहती है। इसीलिए इसे देखने का अवसर प्राप्त होता रहता है। मैं अमहट के घाट पर आकर बैठता भी हूँ। कारण इसी नदी से एक आन्तरिक प्रेरणा की अनुभूति होती है। इसकी बहती धारा मन को आनन्दित करती है लेकिन इसकी दशा देखकर वेदना भी होती है जिस कुआनों का जल पहले चाँदी जैसा चकमकता था, जो सदानीरा, प्रबल वेग से बहने वाली थी, जिसकी धाराएं कल कल की ध्वनि करती मन को आनन्दित करती थी आज इतनी कुरूप हो गयी है कि उसका संपूर्ण सौन्दर्य नष्ट सा हो गया है उसकी धाराओं मे अब वेग नही है वह कृशकाय होकर बह रही है शहर के कूड़े-कचरे, गन्दगी ने उसकी प्राकृतिक आभा को छीन लिया है और वह दिनोदिन बढ़ती गन्दगी से कराह उठी है मैंने इसी वेदना की अभिव्यक्ति संग्रह शीर्षक कविता में किया है। यद्यपि कविता छोटी है लेकिन इसका उद्देश्य सार्थक है। कुआनों जैसी न जाने कितनी नदियों का यही हाल है, लोग जागरूक हो और प्रदूषित होती जीवनदायनी नदियों को बचाने हेतु सार्थक पहल करें, जिससे इनके गौरव को अक्षय रखा जा सके। यद्यपि यह सत्य है कि बस्ती शहर के कुछ सामाजिक संगठनों ने कुंआनों नदी को स्वच्छ एवं अविरल बनाये रखने की दिशा में लोगो का ध्यान खीचा है जिसमें चित्रांश क्लब के द्वारा आयोजित ‘कुंआनो आरती’ का कार्यक्रम जनजागरण की दिशा में एक अच्छी पहल है। संग्रह की कविता ” आज हँसी कुछ देख कुआनों” में कुआनों नही की प्रसन्नता की के माध्यम से इसी ओर इशारा किया गया है लेकिन संशय भी है जिसे इसी कविता के अन्तिम पंक्ति में व्यक्त किया गया है।

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