AGRA 15 KILOMETER (paper back) आगरा 15 किलोमीटर

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उपन्यास लिखने का मन पिछले 2 वर्षों से बन रहा था। इस उपन्यास का प्लाट दिमाग़ म घुमड़-घुमड़ कर आ रहा था व मुझे प्रेरित कर रहा था कि इस विषय पर कोई उपन्यास लिखूँ। मेरा अनुभव कहता है कि उपन्यास लिखने का सफर एक उस छोटे बच्चे के सफर जैसा है। जिसे यह तो पता है कि उसे कहाँ जाना है पर उसके सामने बहुत सारे रास्ते हैं और वह नहीं जानता कि किस रास्ते पर चलने से मज़िल मिलेगी। हिम्मत करके वह एक रास्ते पर कदम बढ़ाता है, कुछ देर चलने के बाद उसे अहसास होता है कि यह रास्ता तो आगे बंद है। अतः वह वापस उसी स्थान पर लौटता है। जहां से उसने अपना सफर प्रारंभ किया था। फिर दूसरे रास्ते पर आगे बढ़ता है। लेकिन उस रास्ते पर भी उसे मंज़िल नज़र नहीं आती इसलिये उसे फिर अपने एरिया पर लौटना पड़ता है और तीसरे रास्ते को आज़माना पड़ता है। इतनी मेहनत करने के बाद गर वह हिम्मत हार कर बैठ जाता है तो फिर अकेले वह कभी भी अपनी मंज़िल को ढूंढ नहीं पाता। पर अगर वह अपने हौसले को मजबूत रखके चौथे और ज़रूरत हुई तो पांचवे रास्ते को आज़माता है तो उसे मज़िल पाने से भगवान भी नहीं रोक सकता। बस यही बात मेरे साथ भी लागू हुई। उपन्यास लिखते लिखते मुझे कई बार लगा कि अपनी लेखनी को एक लाजिकल अंत तक पहुंचाना मेरे बस म नहीं। पर मेरा दिमाग मजबूती से ‘विषय-वस्तु’ का दामन पकड़ा रहा और रफ़्ता रफ़्ता आगे बढ़ता रहा। दो साल की कड़ी मशक्कत के बाद आखिर मुझे लगने लगा कि मेरी कोशिश मुझे उस स्थान तक ले आयी है। जहां पहुंच कर मैं पुख़्ता तौर से कह सकता था कि मैंने अपनी मज़िल पा ली है। इस उपन्यास को लिखने के पूर्व मैं कहानियां लिखता था और मेरा एक कहानी संग्रह ‘इन्द्र-धनुष’ 2013 म प्रकाशित हुआ। जब उस किताब का विमोचन किया गया तो मंच पर आसीन साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार उस किताब के बारे म रखे। किसी ने कुछ कहा किसी ने कुछ पर उन सभी साहित्यकारों के उद्गार म एक बात कॉमन थी कि ‘संग्रह’ की सारी कहानियां लंबी-लंबी हैं और सभी कहानियों म बहुत सारे उतार चढ़ाव हैं। अतः इन्हें कुछ और विस्तार देकर उपन्यास की शक्ल दी जा सकती है इसलिये हम समझते हैं कि डॉ संजय दानी के अंदर ये क्षमता साफ नज़र आ रही है कि वे उपन्यास भी लिख सकते हैं और हम चाहते हैं कि अगली बार वे हम अपने उपन्यास के विमोचन हेतु आमत्रित कर। ये हमारी सलाह भी है और हमारा आदेश भी। बस इसी बात को गांठ बांध कर मैंने उपन्यास लिखना प्रारंभ किया और मेरा यह उपन्यास आपके हाथों म है। मैं यह उम्मीद करता हूं कि मेरा यह उपन्यास “आगरा 15 किलोमीटर” पाठकों के दिल को छू सकेगा व उन्ह बहुत पसंद आयेगा। मैं अपने पाठकों से यह भी उम्मीद करता हूं कि इस उपन्यास को पढ़ने के बाद उपन्यास संबंधित अपने विचारों से मुझे अवगत ज़रूर करायगे। अंत म किताब की प्रूफ-रीडिंग म महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने हेतु अपने साहित्यिक मित्र श्री अज़हर कुरैशी का शुक्रिया करता हूं। साथ ही उपन्यास के प्रकाशक श्री मनमोहन शर्मा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद प्रेषित करता हूं।

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