Mujhe kuch kehna ha (मुझे कुछ कहना है)

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1991 से शुरु हुई लेखन-यात्रा में 2016 तक यह 53वाँ संग्रह है। छोटे-मध्यम आकार के समाचार पत्रों-पत्रिकाओं ने सतत् प्रकाशित किया और सराहा है। 300 सम्मान मिले हैं और 20,000 कवितायें और 500 कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। बड़े और साहित्यिक कहे जाने सम्पादकों, प्रकाशकों ने, पत्रिकाओं ने जरूर मेरी रचनाओं को स्वीकार नहीं किया अब तक। शायद मेरे लेखन में कोई कमी रही होगी। समय मिलते ही इस पर विचार करूँगा। और भी बेहतर लिखने का प्रयास करूँगा। बड़ी साहित्यिक संस्थाओं के अपने संगठन, लेखक और अहं हैं। उनके अपने विचार हैं। कोई दलित लेखन की पत्रिका है। कोई स्त्री लेखन की पत्रिका हौं। उन्हें उसी के अनुरूप लेखक चाहिए। मेरा अपना मानना है कि लेखक को किसी वर्ग, जाति में विभक्त नहीं किया जा सकता । लेखक केवल लेखक होता है। किन्तु यह जरूरी नहीं कि हर कोई मेरी बात से सहमत हो। बड़े संगठनों के अपने नियम होते हैं। उनके अपने अहं होते हैं, जिन पर विचार करना उनके लिए संभव नहीं होता। ठीक उसी तरह परम्परावादी लेखक एवं उनके संगठन केवल छंदमुक्त कविताओं को  मुख्य  मानते हैं। विचारों से भरे काव्य को वे कविता मानने से इंकार करते हैं। उनका कहना सच है अपने स्थान पर । वे तुलसी, कबीर का उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करते हैं। अतुकान्त, गद्य, काव्य है और खूब लिखा जा रहा है। इसमें रस नहीं है केवल विचार हैं, लेकिन हैं तो सही। आज के इस दौर में लिखने के लिए कागज-कलम के अलावा डाक खर्च, टाइप खर्च तो है ही। कागज, कलम भी सस्ती नहीं रही। ऐसे में बिना स्थायी, पूर्वजों की सम्पत्ति के बिना पक्की नौकरी या अच्छे व्यवसाय के चलते लिखकर भेजना कठिन कार्य हो गया है। जीवन की आवश्यक जरूरतें तो महंगी हो ही गई हैं। साथ में बीमारी, परिवार, तनाव, सामाजिक, राजनैतिक स्थितियों से भी गुजरना पड़ रहा है। हो सकता है आपका लिखना किसी को तकलीफ दे, भले ही लेखक की मंशा ऐसी न रही हो, तो फिर आपकी माफी से संतुष्ट हो गया तो ठीक अन्यथा पुलिस, कोर्ट-कचहरी से तो आपको गुजरना ही है। मैं असहिष्णुता शब्द का प्रयोग किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष के लिए नहीं करूँगा। मैं इसे इस तरह कहूँगा कि लोगों में सहनशीलता कम हो गई है। बात-बात पर लोगों की धर्म, जाति, भाषा अपमानित होती है।

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1991 से शुरु हुई लेखन-यात्रा में 2016 तक यह 53वाँ संग्रह है। छोटे-मध्यम आकार के समाचार पत्रों-पत्रिकाओं ने सतत् प्रकाशित किया और सराहा है। 300 सम्मान मिले हैं और 20,000 कवितायें और 500 कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। बड़े और साहित्यिक कहे जाने सम्पादकों, प्रकाशकों ने, पत्रिकाओं ने जरूर मेरी रचनाओं को स्वीकार नहीं किया अब तक। शायद मेरे लेखन में कोई कमी रही होगी। समय मिलते ही इस पर विचार करूँगा। और भी बेहतर लिखने का प्रयास करूँगा। बड़ी साहित्यिक संस्थाओं के अपने संगठन, लेखक और अहं हैं। उनके अपने विचार हैं। कोई दलित लेखन की पत्रिका है। कोई स्त्री लेखन की पत्रिका हौं। उन्हें उसी के अनुरूप लेखक चाहिए। मेरा अपना मानना है कि लेखक को किसी वर्ग, जाति में विभक्त नहीं किया जा सकता । लेखक केवल लेखक होता है। किन्तु यह जरूरी नहीं कि हर कोई मेरी बात से सहमत हो। बड़े संगठनों के अपने नियम होते हैं। उनके अपने अहं होते हैं, जिन पर विचार करना उनके लिए संभव नहीं होता। ठीक उसी तरह परम्परावादी लेखक एवं उनके संगठन केवल छंदमुक्त कविताओं को  मुख्य  मानते हैं। विचारों से भरे काव्य को वे कविता मानने से इंकार करते हैं। उनका कहना सच है अपने स्थान पर । वे तुलसी, कबीर का उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करते हैं। अतुकान्त, गद्य, काव्य है और खूब लिखा जा रहा है। इसमें रस नहीं है केवल विचार हैं, लेकिन हैं तो सही। आज के इस दौर में लिखने के लिए कागज-कलम के अलावा डाक खर्च, टाइप खर्च तो है ही। कागज, कलम भी सस्ती नहीं रही। ऐसे में बिना स्थायी, पूर्वजों की सम्पत्ति के बिना पक्की नौकरी या अच्छे व्यवसाय के चलते लिखकर भेजना कठिन कार्य हो गया है। जीवन की आवश्यक जरूरतें तो महंगी हो ही गई हैं। साथ में बीमारी, परिवार, तनाव, सामाजिक, राजनैतिक स्थितियों से भी गुजरना पड़ रहा है। हो सकता है आपका लिखना किसी को तकलीफ दे, भले ही लेखक की मंशा ऐसी न रही हो, तो फिर आपकी माफी से संतुष्ट हो गया तो ठीक अन्यथा पुलिस, कोर्ट-कचहरी से तो आपको गुजरना ही है। मैं असहिष्णुता शब्द का प्रयोग किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष के लिए नहीं करूँगा। मैं इसे इस तरह कहूँगा कि लोगों में सहनशीलता कम हो गई है। बात-बात पर लोगों की धर्म, जाति, भाषा अपमानित होती है।

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