PARYAVARAN KO BACHANE KI CHUNOTIYAN Perfect Paperback

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‘‘प्रकृति सबकी जरूरतें पूरा कर सकती है, परन्तु वह किसी के लालच की पूर्ति कभी नहीं कर सकी । ’’ महात्मा गां/ाी के यह विचार कल भी प्रासांगिक थे और आज भी है । जब तक हमने प्रकृति से उसकी इच्छा के अनुरूप कुछ चाहा वह हमें सहज ही देती रही है, प्रचुर मात्र में देती रही है बगैर किसी अपरो/ा के देती रही है पर जब हमने उसकी लावण्यता को छीनने का प्रयास करना प्रारंभ किया तो प्रकृति ने रूष्ट होना शुरू कर दिया । शनै%–शनै% उसका को/ा बढ़ता जा रहा है और प्रकृति के जिस खजाने को हम सहजता से प्राप्त करते रहे हैं वह अब अप्राप्त की श्रेणी में आता जा रहा है । अप्राप्त के बाद भी प्राप्त करने वाली सम्पदा दूषित और कष्टदायी प्रतीत होने लगी है । हमारा आचरण प्रकृति विरो/ाी स्वरूप् ग्रहण चुका है । हमने तटबंधन को तोड़ा है तो प्रकृति ने अपने स्वभाव में परिर्वतन कर लिया है । दोषी कौन––– ? यह प्रश्न ही गलत है, हम ही तो हैं । हमने ही तो प्रकृति की विनाशलीला को अपनी खुली ांखों से देखा है याकि हम उसमें भागीदार रहे हैं । प्रकृति की हरि चादर को हमने ही तो तहस–नहस किया है, प्रकृति के जल रूपी अमूल्य खजाने पर हमने ही तो डाका डाला है । नदियों के कल–कल करते बहते जल को हमने ही तो विषाक्त किया है और तालाब, कुआं, बाबड़ियों को हमने ही विंगत किया है । प्रकृति के असीम सॉन्दर्य और मुक्त हस्त से जल का दान करने वाले झरने को हमने ही बरबाद किया है या हमने उन्हें मूक दर्शक बन कर बरबाद होते देखा है । मूक बने रहना भी तो सहयोग ही होता है । विशालकाय चट्टानों का वि/वंश हमने ही किेया है पहाड़ियों को /ाूल/ाूसरित करने के अपरा/ाी भी हम ही हैं । दोषी कौन––– ? अब तो यह प्रश्नबेमानी है । हर वह व्यक्ति जो इस /ारा पर रहता है, वह किसी न किसी प्रकार से प्रकृति के इस विनाश का दोषी है ।

225.00

‘‘प्रकृति सबकी जरूरतें पूरा कर सकती है, परन्तु वह किसी के लालच की पूर्ति कभी नहीं कर सकी । ’’ महात्मा गां/ाी के यह विचार कल भी प्रासांगिक थे और आज भी है । जब तक हमने प्रकृति से उसकी इच्छा के अनुरूप कुछ चाहा वह हमें सहज ही देती रही है, प्रचुर मात्र में देती रही है बगैर किसी अपरो/ा के देती रही है पर जब हमने उसकी लावण्यता को छीनने का प्रयास करना प्रारंभ किया तो प्रकृति ने रूष्ट होना शुरू कर दिया । शनै%–शनै% उसका को/ा बढ़ता जा रहा है और प्रकृति के जिस खजाने को हम सहजता से प्राप्त करते रहे हैं वह अब अप्राप्त की श्रेणी में आता जा रहा है । अप्राप्त के बाद भी प्राप्त करने वाली सम्पदा दूषित और कष्टदायी प्रतीत होने लगी है । हमारा आचरण प्रकृति विरो/ाी स्वरूप् ग्रहण चुका है । हमने तटबंधन को तोड़ा है तो प्रकृति ने अपने स्वभाव में परिर्वतन कर लिया है । दोषी कौन––– ? यह प्रश्न ही गलत है, हम ही तो हैं । हमने ही तो प्रकृति की विनाशलीला को अपनी खुली ांखों से देखा है याकि हम उसमें भागीदार रहे हैं । प्रकृति की हरि चादर को हमने ही तो तहस–नहस किया है, प्रकृति के जल रूपी अमूल्य खजाने पर हमने ही तो डाका डाला है । नदियों के कल–कल करते बहते जल को हमने ही तो विषाक्त किया है और तालाब, कुआं, बाबड़ियों को हमने ही विंगत किया है । प्रकृति के असीम सॉन्दर्य और मुक्त हस्त से जल का दान करने वाले झरने को हमने ही बरबाद किया है या हमने उन्हें मूक दर्शक बन कर बरबाद होते देखा है । मूक बने रहना भी तो सहयोग ही होता है । विशालकाय चट्टानों का वि/वंश हमने ही किेया है पहाड़ियों को /ाूल/ाूसरित करने के अपरा/ाी भी हम ही हैं । दोषी कौन––– ? अब तो यह प्रश्नबेमानी है । हर वह व्यक्ति जो इस /ारा पर रहता है, वह किसी न किसी प्रकार से प्रकृति के इस विनाश का दोषी है ।

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