एक सत्र न्यायाधीश की जीवनी

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सुप्रसिद्ध अंग्रेजी कवि और आलोचक पोप अपनी सुविख्यात रचना 'ऐस्से आन दि मैन' में कहता है कि, 'मानव ही मानव के अध्ययन का उपयुक्तम विषय है।' विशुद्ध भौतिक विज्ञान को छोड़कर समाज विज्ञान और मानव संबंधी अन्य विषयों में भी मानव को ही विविध पक्षीय अध्ययन का विषय बनाया जाता है। मानव के अध्ययन में हार्दिकता और तथ्यपरकता का सर्वोत्म रूप जिस साहित्य में उपलब्ध है उसे जीवनी अथवा आत्मकथा कहा जाता है। यह पुस्तक सत्र न्यायाधीश श्री जे.बी. शर्मा के जीवनवृत्त की महज एक औपचारिक कहानी नहीं है। उनके जीवन के उन तमाम नये-पुराने विषय-संदर्भों को समझने-जानने के लिए जब मैंने उनसे बातें की तो सुनकर मुझे लगा कि बीसवीं सदी के मध्योत्तर काल का एक स्मरणीय खण्ड है जिसे व्यक्ति विशेष के परिप्रेक्ष्य में और अधिक प्रेषणीय बनाया जा सकता है क्योंकि कुछ व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेते हैं और कुछ अपने अनुकूल परिस्थितियों को पैदा कर लेते हैं। शर्मा जी इसमें प्रथम कोटि के हैं। ये परिस्थितियों के प्रवाह के साथ बहने वाले नहीं। ऐसे ही व्यक्ति अपने कार्य में सफल होते हैं। मनुष्य सदा दूसरे मनुष्य से प्रेरित-प्रभावित होता है, जो जीवन में कुछ विशेष, कुछ महत्वपूर्ण करने में समर्थ हों, उनके गुण यदि हममें कुछ मात्रा में हों, या उन गुणों को हम महत्त्व तो दें, पर हममें उनका नितान्त अभाव हो, उस अवस्था में व्यक्ति (त्व) हम पर अमिट छाप छोड़ते हैं- हम उनका आख्यान-प्रत्याख्यान कर दूसरों के समक्ष इस आशय से लाना चाहते हैं कि उनसे उन्हें एक दिशा-दृष्टि मिल सके ।

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सुप्रसिद्ध अंग्रेजी कवि और आलोचक पोप अपनी सुविख्यात रचना ‘ऐस्से आन दि मैन’ में कहता है कि, ‘मानव ही मानव के अध्ययन का उपयुक्तम विषय है।’ विशुद्ध भौतिक विज्ञान को छोड़कर समाज विज्ञान और मानव संबंधी अन्य विषयों में भी मानव को ही विविध पक्षीय अध्ययन का विषय बनाया जाता है। मानव के अध्ययन में हार्दिकता और तथ्यपरकता का सर्वोत्म रूप जिस साहित्य में उपलब्ध है उसे जीवनी अथवा आत्मकथा कहा जाता है। यह पुस्तक सत्र न्यायाधीश श्री जे.बी. शर्मा के जीवनवृत्त की महज एक औपचारिक कहानी नहीं है। उनके जीवन के उन तमाम नये-पुराने विषय-संदर्भों को समझने-जानने के लिए जब मैंने उनसे बातें की तो सुनकर मुझे लगा कि बीसवीं सदी के मध्योत्तर काल का एक स्मरणीय खण्ड है जिसे व्यक्ति विशेष के परिप्रेक्ष्य में और अधिक प्रेषणीय बनाया जा सकता है क्योंकि कुछ व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेते हैं और कुछ अपने अनुकूल परिस्थितियों को पैदा कर लेते हैं। शर्मा जी इसमें प्रथम कोटि के हैं। ये परिस्थितियों के प्रवाह के साथ बहने वाले नहीं। ऐसे ही व्यक्ति अपने कार्य में सफल होते हैं। मनुष्य सदा दूसरे मनुष्य से प्रेरित-प्रभावित होता है, जो जीवन में कुछ विशेष, कुछ महत्वपूर्ण करने में समर्थ हों, उनके गुण यदि हममें कुछ मात्रा में हों, या उन गुणों को हम महत्त्व तो दें, पर हममें उनका नितान्त अभाव हो, उस अवस्था में व्यक्ति (त्व) हम पर अमिट छाप छोड़ते हैं- हम उनका आख्यान-प्रत्याख्यान कर दूसरों के समक्ष इस आशय से लाना चाहते हैं कि उनसे उन्हें एक दिशा-दृष्टि मिल सके ।

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